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अंजू डिमरी/देहरादून, फर्स्ट समाचार


आखिर क्या है टपकेश्वर महादेव का इतिहास क्यों महाभारत काल से ही जुड़ा है जल का रहस्य।। वैसे तो भोलेनाथ के कई प्राचीन मंदिर हैं जिनका इतिहास जोड़ा है महाभारत और रामायण से । अखंड देवभूमि में है इनमें से एक ऐसा ही प्राचीन मंदिर भगवान शिव का उत्तराखंड देवभूमि में है। जिसका इतिहास महाभारत काल से जुड़ा हुआ है मंदिर का कुछ खास महत्व और रहस्य जुड़ा हुआ है। टपकेश्वर महादेव मंदिर देहरादून के सबसे प्राचीन मंदिरों में से एक है। पौराणिक मान्यता के अनुसार आदिकाल में भोले शंकर ने देवेश्वर के रूप में यहां दर्शन दिए थे। मंदिर के शिविलंग पर एक चट्टान से पानी की बूंदे टपकती रहती हैं तभी इस मंदिर का नाम टपकेश्वर महादेव पड़ा। भोलेनाथ यहां गुफा में विराजमान हैं। इसका मुख्य गर्भ ग्रह एक गुफा के अंदर है इस गुफा में शिविलंग पर पानी की बूंदे लगातार गिरती रहती हैं। इसी कारण इस मंदिर का नाम टपकेश्वर महादेव पड़ा।

टोंस नदी के तट पर स्थित टपकेश्वर मंदिर की एक पौराणकि कथा के अनुसार यह गुफा द्रोणाचार्य का निवास स्थान माना जाता था। इस गुफा में उनके बेटे अश्वस्थामा पैदा हुए थे। बेटे के जन्म से उनकी मां उनको दूध नहीं मिला पा रही थी उन्होंने भोलेनाथ से प्रार्थना की जिसके बाद भगवान शिव ने गुफा की छत पर गाय के थन बना दिए जिसमें से दूध की धारा बहने लगी। जिसकी वजह से भगवान शिव का नाम दूधेश्वर भी पड़ा। कलयुग में इस दूध की धारा ने पानी का रूप ले लिया इसी कारण यह मंदिर टपकेश्वर मंदिर है। इस मंदिर में दो शिविलंग है यह दोनों गुफा के अंदर स्वयं प्रकट हुए थे शिविलंग को ढकने के लिए रु द्राक्ष का उपयोग किया गया है। मंदिर के आसपास मां संतोषी की गुफा भी है। यह मंदिर टोंस नामक नदी के तट पर स्थित है द्वापर युग में यह नदी तमसा नाम से प्रसिद्ध थी।

यहां पर द्रौणाचार्य ने की थी भगवान शिव की तपस्या

मंदिर के परिसर के आसपास कई खूबसूरत झरने हैं यहां भारी मात्ना में श्रद्धालु आते हैं यहां शाम को भगवान शिव का श्रृंगार किया जाता है।। मान्यता है इस गुफा में कौरव और पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य भगवान शिव की तपस्या करने के लिए आए थे 12 साल उन्होंने तपस्या की थी उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर शिव जी ने उन्हें दर्शन दिए थे उनके अनुरोध पर ही यहां भगवान शिव लिंग के रूप में स्थापित हुए। यहां पर गुरु द्रोणाचार्य जी को भगवान शिव ने अस्त्न-शस्त्न और धनुर्विद्या का ज्ञान दिया था। इस प्रसंग का महाभारत में उल्लेख है।

गढ़ कैंट के पास स्थित है यह मंदिर
यह मंदिर देहरादून से लगभग 6 किलोमीटर दूर गढ़ी कैंट पर स्थित है सावन के महीने में यहां मेला लगता है दर्शन के लिए बहुत भीड़ रहती है ऐसी मान्यता है कि मंदिर में सावन के महीने जल चढ़ाने वाले भक्तों की हर मनोकामना पूर्ण हो जाती है मंदिर जाने के लिए सबसे नजदीक देहरादून रेलवे स्टेशन और बस अड्डा है मंदिर का द्वार सुबह 9:00 बजे से 1:00 बजे तक और 1:30 बजे से शाम 5:30 बजे तक खुला रहता है

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