कहा- इन कानूनों से गरीबों और हाशिए पर मौजूद लोगों को न्याय मिलना मुश्किल हो जाएगा
लुधियाना/सम्राट शर्मा


कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआईएम) ने शुक्रवार को लघु सचिवालय के बाहर सरकार का पुतला फूंका और एडीसी (ज) मेजर अमित सरीन को ज्ञापन सौंपकर केंद्र सरकार द्वारा लागू किए गए तीन नए आपराधिक कानूनों को रद्द करने की मांग की। वक्ताओं ने कहा कि तीन नए आपराधिक कानूनों को रद्द किया जाना चाहिए क्योंकि वे देश को पुलिस राज्य की ओर धकेल देंगे और गरीबों व हाशिये पर पड़े लोगों को न्याय तक पहुंच से वंचित कर देंगे। उक्त दोनों पार्टियों के नेताओं ने संयुक्त रूप से सरकार के दावे की आलोचना करते हुए कहा कि इन कानूनों के माध्यम से उन्होंने औपनिवेशिक विरासत को नष्ट कर दिया है। उन्होंने कहा कि मामले की सच्चाई यह है कि भारतीय आपराधिक कानून समय-समय पर विशेषज्ञों के विभिन्न इनपुट के बाद विकसित हुए और वर्तमान आपराधिक दंड संहिता को 1961 के बाद छठे विधि आयोग के विशेषज्ञों के बीच कई दौर की चर्चा के बाद अंतिम रूप दिया गया था जिसे अस्वीकार कर दिया गया है। वक्ताओं ने कहा कि पिछली प्रणाली ब्रिटिश शासकों द्वारा प्रचलित थी और सीआरपीसी 1973 में बनाई गई थी जो 30 जून 2024 तक लागू थी। इसलिए, सरकार का यह तर्क और प्रचार कि उन्होंने आपराधिक कानूनों में औपनिवेशिक विरासत को खत्म कर दिया है, पूरी तरह से गलत है। वक्ताओं ने आगे कहा कि बहुत कम प्रावधानों को छोड़कर, सभी भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) में सीआरपीसी के समान धाराएं शामिल हैं। वक्ताओं ने कहा कि नये कानून के तहत अगर किसी मामले में 3 से 7 साल की सजा है तो थानेदार को यह तय करना होगा कि एफआईआर दर्ज करनी है या नहीं।
यह भ्रष्टाचार को संस्थागत बना देगा, सत्ता को राजनीतिक शक्ति दे देगा और एसएचओ को इतना शक्तिशाली बना देगा कि वह जघन्य अपराधों में भी यह तय करेगा कि एफआईआर दर्ज करनी है या नहीं और पीड़ित को एफआईआर दर्ज करने की परेशानी उठानी पड़ेगी। उन्होंने कहा कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला दिया है कि यदि अपराध संज्ञेय है, तो पुलिस प्राथमिकी दर्ज करने के लिए बाध्य है। यदि पुलिस ऐसा करने से इंकार करती है तो संबंधित पुलिस अधिकारी के खिलाफ कानून के मुताबिक कार्रवाई की जानी चाहिए.लेकिन नया कानून पुलिस को पूरी छूट देगा । वक्ताओं ने कहा कि कुछ मामलों में संपत्तियों को कुर्क करने की शक्ति, जो न्यायपालिका या विशेष एजेंसियों के पास थी, अब पुलिस को दे दी गई है, जो भारत को एक पुलिस राज्य की ओर ले जाएगी जहां एक नागरिक की स्वतंत्रता और मानवाधिकारों पर व्यापक रूप से अंकुश लगाया जाएगा। इसके अलावा स्वैच्छिक गवाहों की एक नई श्रेणी जोड़ी गई है जो समस्याएँ पैदा करने वाली है। यहाँ एक गंभीर समस्या होने वाली है क्योंकि 1 जुलाई से पहले मौजूद दो तरह के कानूनों और एक नए कानून को मिला दिया जाएगा और यह संकट 20-30 साल तक बना रह सकता है। इस मौके पर कामरेड डीपी मौड़ , डॉ. अरुण मित्रा, बलजीत सिंह साही, एसएस लोटे, चमकौर सिंह, सतनाम सिंह वड़ैच, एमएस भाटिया, गुरविंदर सिंह, राजिंदर पाल सिंह औलख, विजय कुमार, बलविंदर सिंह औलख, एनएस काला, केवल सिंह बनवैत, देव राज, बलबीर सिंह, समर बहादुर सचिवालय सदस्य, निक्का गुरदीप सिंह, अवतार छिब्बर, भजन जग्गी, किरपाल सिंह, बलजीत ग्रेवाल, सोनू गुप्ता, रामब्रिज, जोगिंदर राम, हनुमान प्रसाद, रामपाल तिवारी .आदि ने संबोधन किया।