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उत्तराखंड के गांवों से पलायन कैंसर के फाइनल स्टेज जैसी गंभीर समस्या

उत्तराखंड के गांवों से पलायन की समस्या अब नाईलाज लगती है। यह समस्या कैंसर के फाइनल स्टेज जैसी गंभीर समस्या हो गई। सरकार डॉक्टर की तरह इस खतरनाक बीमारी का इलाज करने में तो जुटी है लेकिन सरकार को भी कोई ठोस दवाई उन्हें नजर नहीं आ रही। कैंसर के फाइनल स्टेज वाले मरीज को ठीक करने के लिए डॉक्टर आखिरी क्षण तक हार नहीं मानते और इलाज की नईं विधाओं का इस्तेमाल करते हैं। सरकारें भी कोशिश कर रही हैं लेकिन पलायन को रोकने के लिए सामाजिक बदलाव की जरूरत भी है।उत्तराखंड के गांवसे पलायन का मुख्य कारण रहा है गांव में सुविधाएं न होना है। 1990 के दशक तक गांवों में यातायात की सुविधाएं नहीं थी। जिसकी वजह से लोगों ने पहले गांवों के नजदीक वाले उन कस्बों में अपने आशियाने बनाए जो सड़क के पास थे। नई शताब्दी के आगमन पर उत्तराखंड राज्य का गठन हुआ और देहरादून राजधानी बनी। उत्तराखंड राज्य गठन से उम्मीद जगी थी कि गांवों में सुविधाएं होंगी और गांव आबाद रहेंगे। गांवों में यातायात की सुविधाएं बढ़ी, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं बढ़ी लेकिन पलायन कम होने के बजाय तेजी से बढ़ गया। गढ़वाल क्षेत्र के लोगों ने देहरादून में अपने आशियाने बनाये वही कुमाऊं क्षेत्र के लोगों ने नैनीताल और हल्द्वानी में अपने आशियाने बना दिए। युवा बड़ी कंपनियों में काम करने के लिए बाहर निकले तो उन्होंने अपने बच्चों को पढ़ाई के लिए शहरों में रख दिए। गांवों के खाली होने का सबसे बड़ा कारण यह रहा कि सरकारी विभागों में कार्यरत लोगों ने देहरादून जैसे शहरों में अपने घर बना दिए। अब वो वीकेंड पर गांव जाने के बजाय शहरों की तरफ जाते हैं। सरकार अगर सरकारी विभागों से रिटायर कर्मचारियों और अधिकारियों को गांवों मे रहने पर विशेष भत्ता दे और उनके स्वास्थ्य के लिए ज्यादा सुविधाएं दे तो लोग रिटायरमेंट के बाद गांव की तरफ जायेंगे। अगर माता पिता गांव में होंगे तो उनके बच्चे वीकेंड या अन्य विशेष मौकों पर गांव जायेंगे। गांवों को आर्थिक धारा में जोड़ने के लिए छोटे छोटे उद्योग ग्रामीण स्तर पर लगाने की जरूरत है। वहां पर तैयार किए जाने वाले प्रोडक्ट को सरकार मार्केट उपलब्ध करवाए। उत्तराखंड सीमांत राज्य है दो देशों से अंतरराष्ट्रीय सीमा लगती है। ऐसे में पलायन सामरिक तौर पर भी बड़ा खतरा है।

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